Rahim ke Dohe Part -2

Rahim Ke Dohe
Rahim Ke Dohe Hindi Digest

In this post you can read lot of Rahim’s dohe.For more dohe of Rahim you can click on Rahim ke Dohe Part-1

रहिमन अंसुवा नयन ढरि, जिय दुःख प्रगट करेइ,
जाहि निकारौ गेह ते, कस न भेद कहि देइ.

 
रहीम कहते हैं की आंसू नयनों से
बहकर मन का दुःख प्रकट कर देते हैं। सत्य ही है कि जिसे घर से निकाला जाएगा वह
घर का भेद दूसरों से कह ही देगा.
“वे
रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग | बाँटन वारे को लगे, ज्यो मेहंदी को रंग |”

 
रहीमदास
जी ने कहा की वे लोग धन्य हैं, जिनका शरीर हमेशा सबका उपकार करता हैं | जिस
प्रकार मेहंदी बाटने वाले पर के शरीर पर भी उसका रंग लग जाता हैं | उसी तरह
परोपकारी का शरीर भी सुशोभित रहता हैं |
 
 माह मास
लहि टेसुआ मीन  परे थल और
त्यों रहीम जग जानिए, छुटे आपुने ठौर

 
माघ
मास आने पर  टेसू का वृक्ष और पानी से बाहर पृथ्वी पर आ पड़ी मछली की दशा
बदल जाती है. इसी प्रकार संसार में अपने स्थान से छूट जाने पर  संसार की
अन्य वस्तुओं की दशा भी बदल जाती है. मछली जल से बाहर आकर मर जाती है वैसे ही
संसार की अन्य वस्तुओं की भी हालत होती है
“दोनों
रहिमन एक से, जों लों बोलत नाहिं | जान परत हैं काक पिक, रितु बसंत के नाहिं |”

 
: रहीम
कहते हैं की कौआ और कोयल रंग में एक समान काले होते हैं. जब तक उनकी आवाज ना
सुनायी दे तब तक उनकी पहचान नहीं होती लेकिन जब वसंत रुतु आता हैं तो कोयल की
मधुर आवाज से दोनों में का अंतर स्पष्ट हो जाता हैं |
 
“छिमा
बड़न को चाहिये, छोटन को उतपात | कह रहीम हरी का घट्यौ, जो भृगु मारी लात |”
उम्र
से बड़े लोगों को क्षमा शोभा देती हैं, और छोटों को बदमाशी. मतलब छोटे बदमाशी करे
तो कोई बात नहीं बड़ो ने छोटों को इस बात पर क्षमा कर देना चाहिये. अगर छोटे
बदमाशी करते हैं तो उनकी मस्ती भी छोटी ही होती हैं. जैसे अगर छोटासा कीड़ा लाथ
भी मारे तो उससे कोई नुकसान नहीं होता.
 
:-
“दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय | जो सुख में सुमिरन करे, तो दुःख
काहे होय |”

 
दुःख
में सभी लोग भगवान को याद करते हैं. सुख में कोई नहीं करता, अगर सुख में भी याद
करते तो दुःख होता ही नही |
 
“खैर,
खून, खाँसी, खुसी, बैर, प्रीति, मदपान. रहिमन दाबे न दबै, जानत सकल जहान |”
 सारा
संसार जानता हैं की खैरियत, खून, खाँसी, ख़ुशी, दुश्मनी, प्रेम और शराब का नशा
छुपाने से नहीं छुपता हैं |
  खीरा
सिर ते काटि के, मलियत लौंन लगाय.
रहिमन करुए मुखन को, चाहिए यही सजाय.

 
खीरे
का कडुवापन दूर करने के लिए उसके ऊपरी सिरे को काटने के बाद नमक लगा कर घिसा
जाता है. रहीम कहते हैं कि कड़ुवे मुंह वाले के लिए – कटु वचन बोलने वाले के लिए
यही सजा ठीक है.
“जो
रहीम ओछो बढै, तौ अति ही इतराय | प्यादे सों फरजी भयो, टेढ़ों टेढ़ों जाय |”

 
लोग
जब प्रगति करते हैं तो बहुत इतराते हैं. वैसे ही जैसे शतरंज के खेल में ज्यादा
फ़र्जी बन जाता हैं तो वह टेढ़ी चाल चलने लता हैं |
“जे गरिब पर हित करैं, हे रहीम बड | कहा
सुदामा बापुरो, कृष्ण मिताई जोग |”
जो
लोग गरिब का हित करते हैं वो बड़े लोग होते हैं. जैसे सुदामा कहते हैं कृष्ण की
दोस्ती भी एक साधना हैं |
 
 रहिमन
नीर पखान, बूड़े पै सीझै नहीं
तैसे मूरख ज्ञान, बूझै पै सूझै नहीं

 
जिस
प्रकार जल में पड़ा होने पर  भी पत्थर नरम नहीं होता उसी प्रकार मूर्ख
व्यक्ति की अवस्था होती है ज्ञान दिए जाने पर भी उसकी समझ में कुछ नहीं आता.
 
 रहिमन
देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि.
जहां काम आवे सुई, कहा करे तरवारि.

 
रहीम कहते हैं कि बड़ी वस्तु को देख
कर छोटी वस्तु को फेंक नहीं देना चाहिए. जहां छोटी सी सुई काम आती है, वहां
तलवार बेचारी क्या कर सकती है?
 
“जो
रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय. बारे उजियारो लगे, बढे अँधेरो होय |”

 
दिये
के चरित्र जैसा ही कुपुत्र का भी चरित्र होता हैं. दोनों ही पहले तो उजाला करते
हैं पर बढ़ने के साथ अंधेरा होता जाता हैं |
 
 तासों ही
कछु पाइए, कीजे जाकी आस
रीते सरवर पर गए, कैसे बुझे पियास

 
: जिससे कुछ पा सकें,
उससे ही किसी वस्तु की आशा करना उचित है, क्योंकि पानी से रिक्त तालाब से प्यास
बुझाने की आशा करना व्यर्थ है.
 
“रहिमन
विपदा ही भली, जो थोरे दिन होय | हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय |”

 
संकट
आना जरुरी होता हैं क्योकी इसी दौरान ये पता चलता है की संसार में कौन हमारा हित
और बुरा सोचता हैं |
 
संपत्ति भरम गंवाई के हाथ रहत कछु नाहिं
ज्यों रहीम ससि रहत है दिवस अकासहि माहिं
जिस
प्रकार दिन में चन्द्रमा आभाहीन हो जाता है उसी प्रकार जो व्यक्ति किसी व्यसन
में फंस कर अपना धन गँवा देता है वह निष्प्रभ हो जाता है.
 

“चाह गई चिंता मिटीमनुआ बेपरवाह | जिनको कुछ नहीं चाहिये, वे साहन के साह |”

 
जिन
लोगों को कुछ नहीं चाहिये वों लोग राजाओं के राजा हैं, क्योकी उन्हें ना तो किसी
चीज की चाह हैं, ना ही चिन्ता और मन तो पूरा बेपरवाह हैं |
 

“रहिमन वे नर मर गये, जे कछु मांगन जाहि | उतने पाहिले वे मुये, जिन मुख निकसत
नाहि |”

 
जो
इन्सान किसी से कुछ मांगने के लिये जाता हैं वो तो मरे हैं ही परन्तु उससे पहले
ही वे लोग मर जाते हैं जिनके मुह से कुछ भी नहीं निकलता हैं |
 
 जो रहीम
उत्तम प्रकृति, का करी सकत कुसंग.
चन्दन विष व्यापे नहीं, लिपटे रहत भुजंग.
रहीम
कहते हैं कि जो अच्छे स्वभाव के मनुष्य होते हैं,उनको बुरी संगति भी बिगाड़
नहीं पाती. जहरीले सांप चन्दन के वृक्ष से लिपटे रहने पर भी उस पर कोई जहरीला
प्रभाव नहीं डाल पाते.
रहिमन
चुप हो बैठिये, देखि दिनन के फेर | जब नाइके दिन आइहैं, बनत न लगिहैं देर |”

 
जब
बुरे दीन आये तो चुप ही बैठना चाहिये, क्योकी जब अच्छे दिन आते हैं तब बात बनते
देर नहीं लगती |
 
जैसी परे सो सहि रहे, कहि रहीम यह देह.
धरती ही पर परत है, सीत घाम औ मेह.

 
रहीम कहते हैं कि जैसी इस देह पर
पड़ती है – सहन करनी चाहिए, क्योंकि इस धरती पर ही सर्दी, गर्मी और वर्षा पड़ती
है. अर्थात जैसे धरती शीत, धूप और वर्षा सहन करती है, उसी प्रकार शरीर को
सुख-दुःख सहन करना चाहिए.
“रहिमन
पानी राखिये, बिन पानी सब सुन | पानी गये न ऊबरे, मोटी मानुष चुन |”

 
इस
दोहे में रहीम ने पानी को तीन अर्थों में प्रयोग किया है, पानी का पहला अर्थ
मनुष्य के संदर्भ में है जब इसका मतलब विनम्रता से है. रहीम कह रहे हैं की
मनुष्य में हमेशा विनम्रता होनी चाहिये | पानी का दूसरा अर्थ आभा, तेज या चमक से
है जिसके बिना मोटी का कोई मूल्य नहीं | पानी का तीसरा अर्थ जल से है जिसे आटे
से जोड़कर दर्शाया गया हैं. रहीमदास का ये कहना है की जिस तरह आटे का अस्तित्व
पानी के बिना नम्र नहीं हो सकता और मोटी का मूल्य उसकी आभा के बिना नहीं हो सकता
है, उसी तरह मनुष्य को भी अपने व्यवहार में हमेशा पानी यानी विनम्रता रखनी
चाहिये जिसके बिना उसका मूल्यह्रास होता है |
वृक्ष कबहूँ नहीं फल भखैं, नदी न संचै नीर
परमारथ के कारने, साधुन धरा सरीर !

 
वृक्ष
कभी अपने फल नहीं खाते, नदी जल को कभी अपने लिए संचित नहीं करती, उसी प्रकार
सज्जन परोपकार के लिए देह धारण करते हैं !
 वरू
रहीम  कानन भल्यो वास करिय फल भोग
बंधू मध्य धनहीन ह्वै, बसिबो उचित न योग
रहीम
कहते हैं कि निर्धन होकर बंधु-बांधवों के बीच रहना उचित नहीं  है इससे
अच्छा तो यह है कि वन मैं जाकर रहें और फलों का भोजन करें.
“मन
मोटी अरु दूध रस, इनकी सहज सुभाय | फट जाये तो न मिले, कोटिन करो उपाय |”

 
मन,
मोती, फूल, दूध और रस जब तक सहज और सामान्य रहते हैं तो अच्छे लगते हैं लेकिन
अगर एक बार वो फट जाएं तो कितने भी उपाय कर लो वो फिर से सहज और सामान्य रूप में
नहीं आते |
 

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